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ईद मिलाद-उन-नबी पर `करुणा दिवस’… कोरोना काल में पर्व काल / सैयद सलमान
Friday, October 23, 2020 9:53:33 AM - By सैयद सलमान

मुस्लिम समाज इस वर्ष ईद मिलाद-उन-नबी को `करुणा दिवस’ के रूप में मनाने जा रहा है
साभार- दोपहर का सामना 23 10 2020

इस वर्ष मार्च के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के अंत तक सभी धर्मों के, सभी बड़े त्यौहार कोरोना महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन की भेंट चढ़ गए। सभी धर्मों की इबादतगाहें भी बंद हैं। नाम मात्र की संख्या में पूजा-उपासना-इबादत के लिए संबंधित इबादतगाहों के धर्मगुरुओं और ज़िम्मेदारों को छूट दी गई है। होली, दिवाली, ईद, ईस्टर जैसे उल्लास से मनाए जाने वाले त्योहारों पर फीकापन हावी रहा। इसी अक्टूबर माह की ३० तारीख़ को ईद मिलाद-उन-नबी का पर्व भी है जो अब तक पूरे जोश और उत्साह से मनाया जाता था। इस बार इस पर्व पर भी कोरोना का साया है। इस्लामी कैलेंडर के हिसाब से यह रबी-अल-अव्वल का महीना है, जिसकी १२ तारीख को पैग़ंबर मोहम्मद साहब का जन्म हुआ था। कुछ फ़िरकों और मसलक को छोड़ दें तो मोहम्मद साहब के जन्मदिन को 'ईद मिलाद-उन-नबी' के रूप में मनाया जाता है। ख़ासकर भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की जैसे मुल्कों में इसे पूरे उत्साह से मनाया जाता है। हालांकि कहा जाता है १५८८ में उस्मानिया साम्राज्य में इसे त्यौहार के रूप में मनाने का प्रचलन जन मानस में सर्वाधिक प्रचलित हुआ। ईद का अर्थ होता है उत्सव मनाना और मिलाद का अर्थ होता है जन्म होना। मिलाद शब्द का मूल 'मौलिद' है जिसका अर्थ अरबी में 'जन्म' है। इसलिए इसे ईद मिलाद-उन-नबी का नाम दिया गया।

हमारे देश में भी ईद मिलाद-उन-नबी को त्यौहार का दर्जा हासिल है, जिसमें जलसे-जुलूस, वाज़-बयान आदि का आयोजन किया जाता है। इस दिन को त्यौहार के रूप में न मनाने वाले तबके का तर्क है कि, चूंकि इसी रबी-अल-अव्वल के १२ वें दिन ही मोहम्मद साहब की वफ़ात भी हुई थी इसलिए इसे पर्व का रूप देना ग़लत है। उनके तर्क में यह भी इज़ाफ़ा किया जाता है कि मोहम्मद साहब की हयाती में उनका जन्मदिन मनाए जाने का कहीं कोई ज़िक्र नहीं मिलता। बहरहाल इस दिन आम मुसलमान मोहम्मद साहब के प्रति अपनी आस्था के अनुरूप नफ़िल नमाज़ें पढ़ते हैं, कुछ लोग रोज़े भी रखते हैं और सदक़े-ख़ैरात भी करते हैं। वैसे इस दिन को अपने-अपने हिसाब से किसी भी रूप में मनाया जा रहा हो, लेकिन तमाम मुसलमान इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि मोहम्मद साहब की शिक्षा को आमजनों तक पहुंचाना सबकी ज़िम्मेदारी है।

अरब में मोहम्मद साहब ने ऐसे समय में जन्म लिया था जब वहां के हालात बेहद ख़राब थे। पूरा अरब सामाजिक और धार्मिक बिगाड़ का शिकार था। असंख्य क़बीले थे, जिनके अलग-अलग नियम और क़ानून थे। कमज़ोर और ग़रीबों पर ज़ुल्म होते थे और औरतों का जीवन सुरक्षित नहीं था। बच्चियों को जिंदा दफ़न कर दिया जाता था। विधवाओं से बुरा सलूक होता था। छोटी-छोटी बात पर तलवारें खिंच जाना और ख़ून की नदियां बह जाना आम बात थी। इंसानियत शर्मसार हो रही थी। ऐसे समय में ईशदूत के रूप में मोहम्मद साहब ने इंसानों की रहनुमाई की। मोहम्मद साहब ने लोगों को एकेश्वरवाद की शिक्षा दी। अल्लाह की प्रार्थना पर बल दिया। लोगों को पाक-साफ़ रहने के नियम बताए। उन्होंने लोगों के जानमाल की सुरक्षा की भी ताक़ीद की। मोहम्मद साहब को ख़ातिम-उन-नबी का लक़ब भी दिया गया है, यानि आख़िरी नबी। मोहम्मद साहब की शिक्षा का मूल है, 'सबसे अच्छा इंसान वह है जिससे मानवता की भलाई होती है।' उन्होंने शिक्षा दी थी कि जो ज्ञान का आदर करता है, वह मेरा आदर करता है। ज्ञान को ढूंढ़ने वाला अज्ञानियों के बीच वैसा ही है जैसे मुर्दों के बीच ज़िंदा। मोहम्मद साहब ने अपने अनुयायियों को भूखे को खाना देने, बीमार की देखभाल करने, अगर कोई अनुचित रूप से बंदी बनाया गया है तो उसे मुक्त करने, आफ़त के मारे प्रत्येक व्यक्ति की सहायता करने और उसमें मुस्लिम या ग़ैर-मुस्लिम का भेद न करने की नसीहत की थी।

दरअसल मोहम्मद साहब की इसी शिक्षा के आधार पर ईद मिलाद-उन-नबी पर्व को सामाजिक एकता, आपसी भाईचारा और शांति के साथ सबकी समृद्धि की भावना को बढ़ावा देने वाला होना चाहिए था। लेकिन इसे केवल जलसे-जुलूस की चकाचौंध में खो दिया गया। मोहम्मद साहब की शिक्षा को सही तरीक़े से पेश करने में कहीं न कहीं मुसलमानों से चूक हुई है इस सत्य को स्वीकार करना होगा। वरना क्या वजह है कि, जिन्हें 'रहमतुल-लिल-आलमीन' कहा गया हो, यानि 'तमाम आलम के लिए रहमत', वह केवल एक धर्म की जागीर मान लिए गए? मोहम्मद साहब ही नहीं भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, गौतम बुद्ध, महावीर, हज़रत ईसा, हज़रत मूसा, गुरु नानक जैसे नाम भी किसी एक धर्म के लिए नहीं बल्कि तमाम इंसानों के लिए आदर्श होने चाहिए थे, लेकिन दुर्भाग्य से इन सबके अनुयायियों ने उन्हें किसी एक धर्म में क़ैद कर दिया। अगर इन सभी की शिक्षा और संदेश सभी में एक सामान प्रसारित होते तो दुनिया में जारी अनेक धार्मिक विवादों को टाला जा सकता था।

ईद मिलाद-उन-नबी पर इस बार मुस्लिम समाज के कुछ बुद्धिजीवियों की तरफ़ से एक नई पहल की जा रही है। मुस्लिम समाज इस वर्ष इस दिन को 'करुणा दिवस' के रूप में मनाने जा रहा है। उत्तरप्रदेश के रामपुर से इस मुहिम की शुरुआत हुई है। परंपरागत इस्लामी धर्मगुरुओं की छवि से अलग उदारवादी रुख़ के प्रचारक मौलाना सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ ने मोहम्मद साहब की सार्वभौमिक और करुणामयी भूमिका को लेकर इस अभियान की शुरुआत की है। उस दिन नफ़रत का जवाब मुस्कुराहट से देकर सही इस्लाम का संदेश दिया जाएगा। सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी रंज-ओ-ग़म देखती और ग़ैर-इंसानी तौर पर नफ़रत के आधार पर बंटी इस दुनिया को एकसूत्र में पिरोने की इस मुहिम को सहयोग मिलना चाहिए। क्या यह सही समय नहीं है कि नफ़रतों की इस कड़ी को तोड़ा जाए? बेशक अपने पैग़ंबर के नक़्शेक़दम पर चलकर इस्लाम और मुसलमानों की सकारात्मक भूमिका को दुनिया के सामने रखा जा सकता है। करुणा दिवस के रूप में ईद मिलाद-उन-नबी को मनाकर जग में फैले क्रोध को सहानुभूति से, अवमानना को करुणा से, क्रूरता को दया से, विरोधियों को क्षमा करके, किसी के दोष को खोजने से बचकर दूर किया जा सकता है। इस्लाम की इन्हीं सीख को मोहम्मद साहब ने आम किया।

इस मुहिम का मक़सद है कि इस बार १२ रबी-उल-अव्वल को करुणा दिवस के रूप में मनाते हुए मुस्लिम समाज इसे अपने व्यवहार से दर्शाएं भी। इस दिन दया और करुणा के अधिक से अधिक कार्य करें। पेड़ लगाएं, भूखों को खाना खिलाएं, यतीम, बेवा, बेसहारा लोगों की मदद करें, अपने पड़ोसियों को तोहफ़े दें या अपने घर के बने बेहतरीन पकवान भेजें, मोहल्ले की सफ़ाई करें, किसी ग़रीब के बच्चों की फ़ीस भर दें, किसी ज़रूरतमंद को कपड़े सिलवा दें, किसी मुसाफ़िर को उसकी मंज़िल तक पहुंचाने में हाथ बंटाएं। यानि हर वो बेहतरीन आमाल करें जिसकी शिक्षा इस्लाम ने दी और जैसा मोहम्मद साहब किया करते थे। ध्यान रहे, ऐसा करते वक़्त प्रांत, भाषा, जाति, धर्म का कोई भेद न रखें। किसी भी रूप में किसी के भी चेहरे पर मुस्कुराहट लाने में अगर आप कामयाब होते हैं तो यही सच्चा दीन है, यही सही इस्लाम है, यही मोहम्मद साहब की शिक्षा है।

मोहम्मद साहब के विश्व बंधुत्व, दया, करुणा, सहिष्णुता और मानवता की भलाई की दिशा में काम करने वाले संदेशों को अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित करने की जरूरत है। ज़रूरत इस बात की है कि मुस्लिम समाज मोहम्मद साहब के जन्मदिन पर उनके जीवन और आदर्शों को याद करे और ख़ुद को मानवता की सेवा में समर्पित करे। मोहम्मद साहब ने इंसान को इंसान से जोड़ने, आपसी भाईचारा क़ायम करने, दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान करने और एकता बनाए रखने की जो तालीम दी थी, वह किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए थी। आज की परिस्थितियों में मोहम्मद साहब का संदेश और अधिक प्रासंगिक है। उनके बताए रास्ते पर चलकर संसार में भाईचारा और अमन-चैन का माहौल क़ायम किया जा सकता है। यह अवसर है जब सभी को विश्व बंधुत्व में अपना विश्वास पुन: स्थापित करना चाहिए, जिससे समाज के कल्याण और मानवता के समग्र विकास में उत्तम योगदान दिया जा सके। मुसलमानों को कोरोना रुपी 'आपदा' में भी मोहम्मद साहब के जन्मदिन पर एक सकारत्मक 'अवसर' मिला है। इस बात का सुनहरा मौक़ा है कि इस बार ईद मिलाद-उन-नबी पर करुणा दिवस मनाकर पूरे विश्व को मानवता के एकसूत्र में पिरोने का महाभियान चलाया जाए।


(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में विजिटिंग फैकेल्टी हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)