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बार-बार उमरा का क्या औचित्य ? / सैयद सलमान
Friday, February 21, 2020 - 2:16:47 AM - By सैयद सलमान

बार-बार उमरा का क्या औचित्य ? / सैयद सलमान
सैयद सलमान

साभार- दोपहर का सामना 21 02 2020

इन दिनों उर्दू सहित मुस्लिम मोहल्लों में बड़ी संख्या में बिकने वाले हिंदी, मराठी, अंग्रेजी, गुजरती सहित अन्य भाषाओं के अख़बारों में 'उमरा' टूर के विज्ञापन बड़ी संख्या में दिखाई दे रहे हैं। हर वर्ष रमजान जब भी नजदीक आने को होता है, खासकर २-३ महीने पहले से उमरा की बुकिंग बढ़ जाती है। ऐसी मान्यता है कि रमजान के महीने में आम दिनों की इबादत या नेकी की तुलना में ७० गुना अधिक पुण्य मिलता है। एक रोजे का सवाब, एक नमाज का सवाब या फिर किसी भी इबादत के बदले ७० गुना सवाब मिलने की बात जानकर भला कौन सा मुसलमान होगा जो इबादत से पीछे हटना चाहेगा। गरीब मुसलमान तो रोजे रख कर, नमाज पढ़ कर ही सब्र कर लेता है, लेकिन धनी मुसलमान उमरा की नीयत से मक्का-मदीना पहुंचकर और भी शिद्दत से इबादत करने का इरादा करता है ताकि रोजे के साथ-साथ अन्य इबादत का भी उसे ७० गुना सवाब मिले। उमरा करना भी चाहिए इस से किसी को इनकार नहीं है। लेकिन क्या केवल धन की नुमाइश के लिए हर वर्ष या बार-बार उमरा के लिए जाना सच में इस्लामी लिहाज से दुरुस्त है? क्या कभी मुस्लिम समाज के इस गंभीर सवाल पर उलेमा और मुफ़्ती हजरात ने गौर किया है? जबकि सभी जानते हैं कि मुस्लिम समाज की अन्य कई परेशानियों से निजात दिलाने में इस धन का इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालांकि मुस्लिम समाज का बुद्धिजीवी और जागरूक तबका शादी-ब्याह में बेजा खर्च के खिलाफ अक्सर मुहिम चलाता रहा है। इसके साथ-साथ बार-बार उमरा करने वालों को समझाने की भी कोशिश हो रही है। यही बुद्धिजीवी तबका चाहता है कि बार-बार उमरा जाने पर खर्च होने वाली रकम को कौम की तालीम और भलाई के दीगर कामों में लगाना चाहिए, जिसकी इस बदहाल समुदाय को सख्त जरूरत है। लेकिन मुस्लिम समाज के अधिकांश उलेमा हजरात इस मुहिम की धार को कुंद करने में सफल होते रहे हैं। इस विषय पर अधिकांश उलेमा आम मुसलमानों को यह समझा देते हैं कि जकात अदा करने के बाद उन्हें अपना माल अपनी मर्जी से खर्च करने की इजाजत है। नियमित रूप से उमरा करने वाले उलेमा की इस बात को मान लेते हैं और इस विचार का सहारा लेते हैं कि जकात अदा हो गई है, इसलिए अब अपने धन का अपनी मर्जी से इस्तेमाल करने के लिए हम स्वतंत्र हैं। जबकि सही इस्लामी नुक्तए-नजर से यह पूरी तरह नकारात्मक सोच है। जकात फर्ज है और इस्लाम के पांच आधार स्तंभों में से एक है। जकात एक निश्चित राशि से ज्यादा कमाने वाले मालदार मुसलमानों के लिए सालाना अनिवार्य टैक्स के सामान है। समूची बचत पर सालाना २.५ प्रतिशत जकात हर मुसलमान को अदा करनी ही है। यह बचत चाहे नकद राशि के रूप में हो, चाहे बैंक बैलेंस, बॉन्ड्स या धन के अन्य रूप जैसे सोना, चांदी या हीरा के रूप में। जकात, हज और उमरा एक दूसरे से भिन्न इबादत हैं, जिनका एक दूसरे से कोई संबंध नहीं है।

एक साधारण अनुमान के मुताबिक लगभग ढाई लाख मुसलमान हर साल उमरा अदा करने के लिए मक्का-मदीना का सफर करते हैं। इस पर कम से कम एक से दो लाख रुपए प्रति व्यक्ति खर्च आता है। इस तरह साल भर में मुसलमान सिर्फ उमरा करने के लिए अंदाजन चार हजार करोड़ रुपए के आसपास की भारी-भरकम रकम खर्च कर देते हैं। इस तथ्य को दूसरे तरीके से देखें तो हम पाते हैं कि मुसलमान एक ऐच्छिक इबादत के लिए कई सौ करोड़ रुपए उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं, जितनी रकम भारत सरकार अपने सारे अल्पसंख्यकों के लिए बजट में रखती है। इसमें बार-बार किए जाने वाले हज का खर्च नहीं जोड़ा गया है, वरना यह रकम और बढ़ जाएगी। इस भारी-भरकम खर्च को देखते हुए अगर इसका पचास प्रतिशत भी मुस्लिम कौम की तामीर और तरक्की के लिए खर्च कर दिया जाए तो इंकलाबी तब्दीली देखने को मिल सकती है। अगर पूरी ईमानदारी से इस बात की समीक्षा की जाए तो ज्ञात होगा कि मुसलमानों के जरिये खर्च की जाने वाली इस रकम का सबसे ज्यादा फायदा टूर ऑपरेटर्स, हवाई कंपनियों और तेल की दौलत से मालामाल सऊदी अर्थ व्यवस्था को पहुंच रहा है। ऐसे में जबकि सच्चर कमेटी रिपोर्ट भी भारतीय मुसलमानों की सामाजिक व आर्थिक दुर्दशा को जग-जाहिर कर चुकी है, इतनी भारी रकम का इस तरह खर्च किया जाना समझ से परे है। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत राष्ट्रीय उद्यम आयोग (एनसीईयूएस) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में मुसलमानों की ८४ फीसद आबादी की दैनिक आय ५० रुपए से भी कम है। यानि लगभग १५ करोड़ मुसलमान रोजाना ५० रुपए भी नहीं कमा पाते। इसे देखते हुए धनवान या समर्थ मुसलमानों का क्या यह कर्तव्य नहीं बनता कि वे इस दयनीय स्थिति को सुधारने के उपाय करें? यह जान लेना जरूरी है कि अल्लाह को किसी की नफिल यानि ऐच्छिक इबादतों की कोई ऐसी खास जरूरत नहीं है, वह भी तब, जब लगभग १५ करोड़ लोग गरीबी के दलदल में धंसे हुए हों। इस्लाम में ‘हुकूक-अल्लाह’ यानि अल्लाह के अधिकारों पर ‘हुकूकुल-इबाद’ यानि बंदे के अधिकारों को भी प्रमुखता दी गई है। साथ ही फिजूलखर्च को भी सख्ती से मना किया गया है। काश मुसलमान इस बात को समझ पाते।


उमरा असल में हज का ही एक रूप यानि एक ‘लघु तीर्थ यात्रा’ है। हज की तरह ही यह इबादत भी मक्का में ही अदा की जा सकती है। हज की इबादत मालदार मुसलमानों के लिए कुछ शर्तों के साथ जिंदगी में एक बार फर्ज यानि अनिवार्य है। उमरा और हज की प्रक्रियाओं में कई समानताएं हैं। जैसे उमरा करने की विशेष नीयत यानि दिल से इरादा करना, हज के दौरान पहने जाने वाले विशेष लिबास 'अहराम' को धारण करना, मक्का स्थित पवित्र ‘काबा’ की सात बार परिक्रमा करना, काबे की मस्जिद यानि ‘हरम शरीफ’ में रखे काले पत्थर ‘संग-ए-असवद’ को स्पर्श करना और मौका मिले तो उसे बोसा देना अर्थात चूमना, ‘मुकाम-ए-इब्राहीम’ नामक स्थान पर दुआएं करना, जमजम का पाक पानी पीना और अपने ऊपर छिड़कना, ‘सफा’ व ‘मर्वा’ नामक छोटी पहाड़ियों के बीच सात बार हल्की दौड़ लगाना जिसे ‘सई’ कहते हैं, मर्द तीर्थ यात्री का मुंडन कराना जैसे अहकामात उमरा की पूर्ण इबादत में शामिल हैं। इस इबादत से रूहानी सुकून मिलता है इस से भी किसी को इनकार नहीं है। लेकिन क्या वक़्त नहीं आ गया कि मालदार मुसलमान इस बात गौर करना शुरू करे कि बार-बार उमरा जाने पर जितना खर्च होता है, क्या वह रकम मुस्लिम समाज के किसी जनहित से जुड़े काम में नहीं खर्च की जा सकती? ध्यान रहे, उमरा की यात्रा इस्लाम की अनिवार्य यानि फर्ज इबादतों में शामिल नहीं है। यह एक स्वैच्छिक इबादत है और इसे हर साल किया जाना भी जरूरी नहीं है। इसके बजाय क्या एक या दो बार उमरा करने के बाद बार-बार उमरा न करते हुए अपनी बचत राशि मुस्लिम समुदाय के सामाजिक-आर्थिक उत्थान में नहीं लगाई जा सकती, जिसकी मुसलमानों को सख्त जरूरत है? इस्लाम में यह भी प्रावधान है कि आप 'हज-ए-बदल' कर सकते हैं यानि अपनी हलाल कमाई के पैसों से किसी दूसरे को हज करवा सकते हैं जिसका सवाब भी दोनों को सामान रूप से मिलेगा। और यही प्रावधान तो उमरा के लिए भी है। इस तरह कई गरीब मुसलमान हज और उमरा की सआदत हासिल कर सकते हैं। लेकिन बात जब इबादत और मुसलमान के बीच की हो तो जायज सवाल उठाना भी किसी जोखिम से कम नहीं है। लेकिन इस्लाम के दायरे में रहकर अब मुसलमानों की भलाई के लिए और उनकी बदहाली का रोना खत्म करने के लिए क्रांतिकारी फैसले लेना बेहद जरूरी हो गया है।