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…..मुसलमान को क्या मिला? / सैयद सलमान
Friday, January 15, 2021 3:51:45 PM - By सैयद सलमान

ओवैसी उसी तरह से मुस्लिम हित की बात करते हैं जैसा कि उनसे पहले के मुस्लिम रहनुमा करते आए हैं।
साभार- दोपहर का सामना 15 01 2021

सियासत के दांव-पेंच हर किसी के बस की बात नहीं। बड़े-बड़े सियासी सूरमा यह ​अंदाज़ा नहीं लगा पाते कि सियासत में उनका भविष्य क्या होगा। कब उनकी ​क़िस्मत का सितारा चमकेगा या कब वह नकार दिए जाएंगे। लेकिन इतना तो तय है कि जब जमकर सियासत होती है तो नतीजे भी उसी तरह के आते हैं जैसी अमूमन अपेक्षा की जाती है। ​वक़्त भले लग जाए लेकिन लगातार संघर्ष ही राजनेता या राजनैतिक दल को उसकी मंज़िल तक ​ज़​रूर पहुंचाते हैं। संघर्ष से हटते ही सियासत ​ज़​मीन चटा देती है। इस बात के अनेक उदाहरण देखने को मिल जाएंगे। सियासत में यह भी कहा जाता है कि जब किसी ​क़ौम की बुद्धि पर पत्थर पड़ जाए तो वह अपने मित्र और शत्रु के बीच अंतर नहीं कर सकता है। यह एक प्रकार से ​ख़ुद की अस्मिता को नष्ट करने के लिए या दुविधा में आकर परेशान होने के ​ख़ुद ही नए-नए ​तरीक़े खोजने के समान होता है। यही अब मुस्लिम समाज के साथ हो रहा है। मुस्लिम समाज की राजनीति को समझने वाले अब मानने लगे हैं कि बिहार चुनाव परिणाम से धीरे-धीरे यह आभास हो रहा है कि मुस्लिम समाज ने ​ख़ुद को दुविधा में रखने का एक नया ​तरीक़ा खोज लिया है और उसका नाम असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहाद-ए-मुस्लिमीन है। मुस्लिम समाज के एक ​तबक़े का मानना है कि बिहार चुनाव परिणामों से एक बात समझ में आती है कि बिहार में एमआईएम ने मुसलमानों को नु​क़​सान और भाजपा को लाभ पहुंचाया। अगर एमआईएम चुनाव में नहीं होती तो इस बात की स्पष्ट संभावना थी कि महागठबंधन की सरकार बिहार में सत्ता में होती और भाजपा गठबंधन हार जाता।

लेकिन तस्वीर का दूसरा रु​ख़​ यह है कि असदुद्दीन ओवैसी अब और भी आक्रामकता के साथ मुस्लिम मतों के जुगाड़ में ​ख़ुद को झोंक दे रहे हैं। बिहार के बाद असदुद्दीन ओवैसी की न​ज़​रें अब पश्चिम बंगाल और उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव पर हैं। पश्चिम बंगाल में अगले साल अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव है। इस चुनाव को लेकर एमआईएम ची​फ़​ ओवैसी ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटरों की संख्या ​क़​रीब २७ ​फ़ीसदी है जिस पर ओवैसी अब अपना एकाधिकार चाहते हैं। जब भी ओवैसी की राजनीति पर सवाल उठते हैं तो बिहार में ही नहीं, बल्कि बिहार के बाहर भी एक बड़ा मुस्लिम वर्ग ओवैसी के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। यह म​ख़​सूस ​तबक़ा इस बात पर ​ज़ो​र देता है कि असदुद्दीन ओवैसी ही एकमात्र ऐसे मुस्लिम नेता हैं जो डंके की चोट पर संसद के अंदर और बाहर मुस्लिम हितों की बात करते हैं। ओवैसी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जो धर्मनिरपेक्ष दलों के मुस्लिम वोट बैंक की पोल खोलते हैं। लेकिन हर राजनीति तभी सफल मानी जाती है जब उसका लाभ उन लोगों तक पहुंचे जिसके लिए वह संचालित की जा रही हो। एक बात यह भी है कि राजनीति करने का एक तरी​क़ा​ या रणनीति होती है। इस रणनीति का उद्देश्य लोगों को नु​क़​सान पहुंचाना नहीं बल्कि इसके तहत आने वाली राजनीति से लाभान्वित होना होता है। सवाल यही है कि क्या ओवैसी की राजनीति से मुसलमानों को ​फ़ायदा हो रहा है? क्या असदुद्दीन ओवैसी मुसलमानों के लिए अच्छे या बुरे हैं? उनके चुनाव से किसे ​फ़ायदा होगा और किसे नु​क़​सान होगा? क्या वे धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को ​कमज़ोर करेंगे या मुस्लिम ता​क़​त के रूप में उभरेंगे? क्या वे मुसलमानों के सच्चे हितैषी हैं या भाजपा के एजेंट हैं? इस तरह के सवालों को सुनना मुसलमानों की मजबूरी भी है और समय की मांग भी। वैसे इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि ओवैसी बंधु मुसलमानों के एक वर्ग के बीच लोकप्रियता हासिल कर चुके हैं और लगातार करते जा रहे हैं।

ओवैसी उसी तरह से मुस्लिम हित की बात करते हैं जैसा कि उनसे पहले के मुस्लिम रहनुमा करते आए हैं। मुस्लिम हित की बात करना बुरा नहीं है, लेकिन मुस्लिम हितों की बात करते-करते मुस्लिम समाज का ही नु​क़​सान कर बैठना कहां की समझदारी है। आ​ज़ा​दी के बाद से ही बड़ी संख्या में मुस्लिम नेतृत्व खुले तौर पर परिणामों पर विचार किए बिना मुलिम मुद्दों को जमकर उछालता रहा है। लगभग तीस साल पहले उसमें और ​तेज़ी आई। याद ही होगा तब बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी खुले आम बाबरी मस्जिद मुद्दे पर बात कर रही थी। ‘मस्जिद नहीं हटाएंगे’ नारा याद ही होगा। वह नारा भी शायद ही कोई मुसलमान भूला होगा जब कहा जाता था, ‘एक बार मस्जिद, फिर ता-क़यामत मस्जिद।’ कई वर्षों से मुस्लिम समाज मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर भरोसा कर ‘तीन तला​क़​ के सामने नहीं झुकेंगे’ जैसी बात कहता आया है।। क्या हुआ उन वादों, नारों का? मुस्लिम हितों की बात करने वाले इन नारों से किसे ​फ़ायदा हुआ? आज बाबरी मस्जिद का कोई नाम या प्रतीक नहीं है। जल्द ही वहां एक भव्य राम मंदिर का निर्माण हो जाएगा। इस देश में तीन तला​क़​ पर ​क़ानूनी पाबंदी लग चुकी है। मुसलमान को क्या मिला? जितनी ऊर्जा इसमें व्यर्थ हुई उतना अगर तालीम में लगाई जाती, शैक्षणिक इदारे खोले जाते, लड़कियों की, कम​ज़ो​रों की, यतीमों की चहुंमुखी विकास वाली शिक्षा पर ​ज़ो​र दिया जाता तो क्या मुसलमान आज शर्मिंदा होता?

मुस्लिम समाज के पास राजनैतिक या शैक्षणिक पिछड़ेपन पर दो ही बहाना होता है। एक, धर्मनिरपेक्ष दलों ने हमें केवल वोट बैंक समझा और विकास में रोड़े अटकाए। दूसरा और महत्वपूर्ण यह कि सांप्रदायिक दलों ने हमारे साथ भेदभाव किया और हमें म​ज़​लूम बनाकर रखा। लेकिन क्या यही दो कारण हैं जो मुसलमानों के पिछड़ेपन का कारण हैं? मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन का कारण उसकी नासमझी भरी राजनीति भी है। एक तो वह राष्ट्रस्तर पर एकमत नहीं होता और दूसरे वह सियासत को सियासत की तरह नहीं बल्कि या तो दरकिनार करता है या युद्ध की तरह लेता है। मुस्लिम नेताओं के अजीबो​-​ग़रीब निर्णय को भी पागलों की तरह आत्मसात करता है। शाही मस्जिद से निकलने वाले ​फ़​तवे कभी देश की मुस्लिम सियासत की दिशा तय करते थे इस बात से भला कौन इनकार करेगा। आज उन ​फ़​तवों की अहमियत नहीं रही। लेकिन आज सीधे-सीधे एक मुस्लिम चेहरा ही उनके सामने मुस्लिम हित की बात करता हुआ सामने है तो फिर राजनैतिक ​फ़​तवों की ​ज़​रूरत ही क्या है। अब देखिये न, ओवैसी जब मुसलमानों को संकेत दे रहे होते हैं कि मुस्लिम अब किसी ​ख़ास दल के इशारे पर ​सिर्फ़ न तो ताली बजाएगा और वोट करेगा बल्कि अब उसे भी सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए तो मुस्लिम समाज का एक तब​क़ा​ ​ख़ुश होकर उनकी बात से सहमति दर्शाता है। क्या यह मुस्लिम समाज के लिए अच्छा संकेत है? अगर है तब तो ठीक, लेकिन अगर यह दांव उल्टा पड़ा तो पहले से ही पिछड़ा मुस्लिम समाज क्या सियासी अखाड़े में चारों खाने चित न​ज़​र नहीं आएगा?

ओवैसी एक राजनैतिक दल के मुखिया हैं तो उन्हें राजनीति करने का ह​क़​ है, इस बात से किसी का कोई इख़्तेला​फ़​ नहीं है। उनके पिता और दादा के ​ज़​माने से उनका परिवार राजनीति में रहा है। इसलिए राजनीति ओवैसी के ​ख़ून में रच-बस गई है। लेकिन उस राजनीति की दिशा और दशा तय करते समय ओवैसी को राजनीति को हथियार के रूप में जो भी इस्तेमाल करना हो करें लेकिन मुस्लिम हितों के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति से बचने की राजनीति करना उनके लिए निहायत ​ज़​रूरी है। मुस्लिम हित के नाम पर अहित ही होता है मुस्लिम समाज का, यह अब तक की राजनीति से लोगों की समझ में आ गया है। लेकिन याद रखिये, अगर ‘नारा ए-तकबीर’ की राजनीति होगी तो प्रतिक्रिया में ‘जय श्रीराम’ की राजनीति भी होगी। उसी तरह, अगर शुद्ध ‘मुस्लिम हित’ की बात होगी तो जैसी ​फ़िज़ा बनी है उसमें ‘हिंदू हित’ की बात होना भी निश्चित है। क्या मुस्लिम समाज इस बात पर ​ग़ौर करेगा कि इस राजनीति से किसको ​फ़ायदा होता है और किसे नु​क़​सान होता है? अगर मुस्लिम समाज अभी भी इसे नहीं समझ पा रहा है तो शायद रोना-पीटना ही इनके मु​क़​द्दर में लिख दिया गया है, जिससे बाहर निकलने को शायद मुस्लिम समाज ​ख़ुद ही तैयार ही नहीं है।

(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में विजिटिंग फैकेल्टी हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)