Sunday, March 7, 2021

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ज़हरीली फ़िज़ा को बदलना ज़रूरी / सैयद सलमान
Friday, January 1, 2021 12:08:11 PM - By सैयद सलमान 

आज़ादी के तिहत्तर सालों बाद भी सांप्रदायिक भेदभाव को बढ़ावा देने वाले बयानों में कमी नहीं आई है
साभार- दोपहर का सामना 01 01 2021

शहीद अशफ़ाक़उल्लाह खान का कलाम है,
मौत को एक बार जब आना है तो डरना क्या है,
हम इसे खेल ही समझा किये मरना क्या है...?

उन्हीं के साथ फांसी पाने वाले पंडित रामप्रसाद बिस्मिल कहते हैं,
अजल से वे डरें जीने को जो अच्छा समझते हैं,
मियां ! हम चार दिन की ज़िंदगी को क्या समझते हैं...?

देश के लिए हंसते-हंसते क़ुर्बान होने वाले जियाले जाबांज़ो की ये पंक्तियां यह अहसास कराती हैं कि आज़ादी के मतवालों की ज़िंदगी में मौत का ख़ौफ़ था ही नहीं। आख़िर उन्हीं जैसे अनेकों शहीदों की क़ुर्बानियों के बदले में देश आज़ाद हुआ और आज देश का प्रत्येक नागरिक खुली और आज़ाद वतन की फ़िज़ाओं में आज़ादी की सांस ले रहा है। इस्लाम कहता है, जिस देश का नामक खाओ, उसकी वफ़ादारी करो। इस्लाम की शिक्षा है, 'हुब्बुल वतनी, निस्लफ़ुल ईमान' अर्थात वतन की मोहब्बत आधा ईमान है। अब भला कौन सच्चा मुसलमान होगा जो ईमान से ख़ारिज होना चाहेगा। वैसे इन दिनों देश के कई गंभीर बुद्धिजीवी इस बहस में शामिल हैं कि देश के मुसलमानों को कैसा होना चाहिए, उनको कैसा दिखना चाहिए, क्या पहनना चाहिए, क्या खाना चाहिए इत्यादि। लेकिन क्या उन लोगों को रामप्रसाद बिस्मिल के रूहानी भाई और हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाले अशफ़ाक़उल्लाह का नाम याद नहीं? क्या वह भूल गये वीर अब्दुल हमीद के शरीर के चीथड़े जो वतन की राह में दुश्मन देश के दांत खट्टे करते वक़्त बिखरे? और क्या वह भूल गए 'नौशेरा का शेर' नाम से विख्यात ब्रिग्रेडियर उस्मान के त्याग और उनकी शहादत को? पूरी तरह भूले न हों तब भी काफी हद तक फ़रामोश करने की कोशिश तो हो ही रही है।

ताज़ा चर्चा है ब्रिगेडियर उस्मान की क़ब्र की अनदेखी की। पिछले दिनों ब्रिगेडियार उस्मान की क़ब्र क्षतिग्रस्त अवस्था में मिलने की ख़बर आई। वह ब्रिगेडियर उस्मान जिन्हें पारा ब्रिगेड की कमान दी गई थी और १९४७ में जो जम्मू-कश्मीर के नौशेरा में तैनात थे। उन्हें झांगर में दोबारा क़ब्ज़ा करने का काम सौंपा गया था। ३ जुलाई १९४८ को वह दुश्मन की गोलीबारी में अपने जीवन के ३६वें वर्ष में ही शहीद हो गए। देश की सेवा में अपने प्राणों की आहुति देने वाले ब्रिगेडियर उस्मान को बाद में महावीर चक्र से सम्मानित किया गया जो सेना का दूसरा सबसे बड़ा पदक है। उन्हें आज भी ‘नौशेरा का शेर’ के नाम से जाना जाता है। वह शायद अकेले भारतीय सैनिक थे जिनके सिर पर पाकिस्तान ने तब ५० हज़ार रुपए का ईनाम रखा था जो उस ज़माने में बहुत बड़ी रक़म हुआ करती थी। देश के विभाजन के वक़्त देश चुनने की जब बात आई तब उस कठिन निर्णय की घड़ी में उन्होंने निजी स्वार्थों को छोड़कर राष्ट्र हित में फैसला लिया और अपने मूल देश की सेवा का मार्ग चुना। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि देश के बंटवारे के समय उनकी क़ाबिलियत के दम पर पाकिस्तान से उन्हें आर्मी चीफ़ बनने का प्रस्ताव दिया गया था लेकिन, सच्चे देशभक्त ब्रिगेडियर उस्मान ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। उन्होंने उसी देश की सेवा करना स्वीकार किया जो उनकी जन्मभूमि थी। अपने वादे, ईमान और देशभक्ति के जज़्बे के साथ ब्रिगेडियर उस्मान ने जीवन पर्यंत देश की सेवा की और यहीं शहादत का जाम पिया। कई सैन्य इतिहासकारों की राय है कि अगर ब्रिगेडियर उस्मान की समय से पहले मौत न हो गई होती तो वो शायद भारत के पहले मुस्लिम थल सेनाध्यक्ष होते।

बता दें कि दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पास कई देशभक्त और महान लोगों को दफ़्न किया गया है। उनकी क़ब्रें अब भी मौजूद हैं लेकिन अब ये सभी अनदेखी का शिकार हैं। कई क़ब्रों का सामने का हिस्सा टूट गया है, कई बेतरतीब होकर अस्त-व्यस्त हो गई हैं और क़ब्रस्तान की दीवारें भी टूट गई हैं। इनमें से ही एक क़ब्र ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की भी है। ब्रिगेडियर उस्मान की क़ब्र पर लगा उनके नाम का शिलालेख भी टूट गया है। कहने को तो धर्मनिरपेक्षता और देशभक्ति की मिसाल के रूप में याद किये जाने वाले ब्रिगेडियर उस्मान की क़ब्र को वीआईपी दर्जा दिया गया है, लेकिन उसकी दुर्दशा कुछ और ही कहानी कह रही है। क़ब्रों की अनदेखी का यहीं एक मसला नहीं है बल्कि देश के विभिन्न कोनों से अनेक महापुरुषों की मज़ारों, समाधियों, उनके मकानों की दुर्दशा की ख़बरें आती रहती हैं लेकिन या तो उनके प्रति सम्मान में कमी आई है या फिर उन महापुरुषों के बारे में शिक्षित करने या उनके इतिहास को बताने के बारे में कहीं न कहीं चूक अवश्य हुई है।

एक बात का रोना यह भी है कि आज़ादी के तिहत्तर सालों बाद भी सांप्रदायिक भेदभाव को बढ़ावा देने वाले बयानों में कमी नहीं आई है। इसका श्रेय उन तमाम लोगों को जाता है जिन्होंने प्रांत, भाषा जाति, धर्म के नाम पर देश को बांटने में कोई कसर नहीं रखी। उनकी धर्मांधता ने लोगों को हिंदू और मुसलमान के नाम पर विभक्त कर दिया है। इतना सब होने के बावजूद कभी ज़िम्मेदार और संवैधानिक पदों पर बैठे शीर्ष नेताओं ने इस बात पर ग़ौर करने की कोशिश नहीं की, कि क्या इसीलिए आजादी मिली थी? दुःख तो इस बात का है कि मुस्लिम समाज ने भी अपने उन शहीदों को भुला दिया है जो उनके लिए आदर्श हैं। हालांकि शहीद अशफ़ाक़, अब्दुल हमीद या ब्रिगेडियर उस्मान जैसे वतन के शहीदों को किसी एक क़ौम का मानना उनके विचारों का अपमान करना होगा, लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि जब भी मुस्लिम समाज पर देश का ग़द्दार होने या उसके देशप्रेम में खोट की बात उछाली जाती है तब यही समाज के हीरो उनकी ढाल बनते हैं। लेकिन क्या कभी मुस्लिम समाज ने आगे आकर उनके संदेशों को आम करने की कोशिश की? सवाल यही है जब मुस्लिम समाज ने ही उन्हें भुला दिया है तब उनकी क़ब्रों की अनदेखी या उनकी शिक्षा के हाशिये पर जाने का रोना भला किसलिए? अशफ़ाक़, अब्दुल हमीद और ब्रिगेडियर उस्मान जैसी विरासत होने के बावजूद मुस्लिम समाज के कुछ इन्तेहापसंदों के कारण माहौल ऐसा बन गया है कि, आम मुसलमान यानि एक ऐसा व्यक्ति जिसकी इस देश के प्रति निष्ठा संदिग्ध है। इन बातों से देश में आपसी मनमुटाव और वैमनस्य तो बढ़ा ही है साथ ही विदेशों में भी भारत की नकारात्मक छवि बन गई है। इस बात का सीधा नुक़सान देश की तरक़्क़ी पर होना है और देश के विकास की दौड में पिछड़ जाने का अंदेशा है।

एक रोना यह भी है कि मुस्लिम समाज इस देश के बड़े वर्ग को यह बात समझा ही नहीं सका कि १८५७ से लेकर १९४७ तक देश के लिए जान देने वाले अनगिनत मुसलमानों के बारे में ऐसा माहौल उन लोगों ने बनाया है जिनका आज़ादी की लड़ाई से कोई वास्ता ही नहीं रहा। मीडिया और अफ़वाहतंत्रों की भी इसमें बड़ी भूमिका रही। देश के बड़े वर्ग को भी यह समझना होगा कि १९४७ में पाकिस्तान जाने का विकल्प होने के बावजूद, ये वतन से मुहब्बत ही तो थी और और यहां के हिंदू भाइयों पर विश्वास ही तो था कि लाखों की संख्या में मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए। ब्रिगेडियर उस्मान उनमें से एक थे, जिन्हें पाकिस्तान में वह सब मिलता जिसकी एक आम इंसान की ख़्वाहिश होती है। लेकिन, वह आम नहीं ख़ास थे। इसीलिए उन्होंने सर्वधर्म समभाव वाले देश के लिए शहीद होना चुना न कि विभाजित देश के उस हिस्से का सैन्य प्रमुख होना जिसकी बुनियाद नफ़रत और धर्म के आधार पर पड़ी हो। आज विवादित बनाकर आतंकगढ़ कहे जाने वाले अविभाजित आज़मगढ़ का शेर ब्रिगेडियर उस्मान शहीद तो हो गया लेकिन अपनी जन्मभूमि, अपनी मातृभूमि को छोड़ना उसने गवारा न किया। क्या यह ज़रूरी नहीं कि ब्रिगेडियर उस्मान की क़ब्र की देखभाल और उसके नूतनीकरण के बहाने पूरे देश को नई पीढ़ी सहित उनके और उन जैसे शहीदों के त्याग की गाथा सुनाई जाए जिस से देश में फैली सांप्रदायिक विद्वेष की ज़हरीली फ़िज़ा को सौहार्द की ख़ुशबू में बदला जा सके?


(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में विजिटिंग फैकेल्टी हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)